Sunday, September 17, 2017

हैप्पी बर्थडे- कादम्बिनी मई 2017 अंक में प्रकाशित


हैप्पी बर्थडे

अरे ये क्या! आज तो 24 जनवरी है। तो क्या? हुआ करे, मेरी बला से। चलूं उठूँ । सुबह के छः बज गये है! दो ही दिन तो हुए है जॉगिंग शुरू किये, अलसियाना ठीक नहीं  लेकिन ये इसकी याद क्यों आ गयी, अचानक? वर्षों हो गये बातचीत हुए, या सच बताऊं, तो ख्याल ही आये। हद है! पचास वर्ष की उम्र में उसका सपने में दिख जाना! उन दिनो तो कभी मेरे सपने में आयी नहीं जब घंटो साथ बीतते थे। हाँ वो कभी कभी छेड़ने के लिए अवश्य  पूछती थी कि यार मैं कभी तुम्हारे सपने वपने में आती हूँ की नहीं, और मैं तुनक के कहता था कि भाई दिन भर का तो साथ रहता है अब कम से  कम नींद में तो चैन से रहने दो । अरे! उठूं भी- ये सब क्या सोचने लगा? अच्छा एक करवट और, बस दो मिनट। तो आज वो सपने में क्यो आ गयी? क्या टेलिपाथी जैसा तो कुछ नहीं हुआ होगा  कि मैं भी उसके ख्यालों में आया होऊंगा? सोच कर अच्छा लगा अरे खाक आया होऊंगा! ये सब टेलिपाथी-वेलापाथी किताबी चीजें हैं।  और वैसे भी, इस सपने में कुछ ऐसा रोमान्टिक तो था नहीं। इस उम्र में, जीवन के यथार्थों से प्रतिक्षण रूबरू होते होते,  ढेरों जिम्मेदारियों के बोझ तले, अब तो सपने भी रूटीन हो गये है। सपने में तो हम झगड़ रहे थे, बहस कर रहे थे- कीट्स के ओड्स पर और अचानक हैमलेट के दर्शन के सार पर। हैमलेट मेरा पसन्दीदा चरित्र था- अनिर्णय से परिपूर्ण और और भविष्य के लिए आशंकित । अन्त में शेक्सपीयर ने कह ही तो दिया था कि आप कुछ नहीं करते, सब कुछ वो ऊपर वाली,  वो सर्वशक्तिमान अदृश्य शक्ति ही करती कराती है। व्यक्ति तो मात्र निमित्त है और सब कुछ उसके जीवन में पूर्व –निर्धारित - ‘There’s a divinity that shapes our ends. । और वो, हैमलेट के अनिर्णय वाले चरित्र की निंदक।

  विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी का वो रीडिंग रूम और बड़ी सी ओवल आकार की टेबल। हम पढ़ रहे थे।  ‘‘ए सुनो,  तुम मुझसे प्रेम तो नहीं करने लगे’’ अचानक उसने छेड़ने के अंदाज़ में पूछा। मैं चौंक उठा, “क्यों? बिल्कुल नहीं”। ‘‘अच्छा मान लो हमारा विवाह हो गया तो’’? पुनः प्रश्न। “तो फिर क्या? पटेगी नहीं एक दिन भी”, मैने कहा। “विवाह की सफलता के लिए, दो अनजान लोगों को करीब आने के लिए, रोमांस आवश्यक है ; और रोमांस आता है नोवेल्टी से, इमैजिनेशन से, इमोशन्स आदि, आदि से। वो हमारे बीच होगा नहीं क्योंकि लगता ही  नहीं  कि इस प्रगाढ़ मैत्री के कारण एक दुसरे के मन के बारे में कुछ डिस्कवर करना बचा है । वैवाहिक सम्बन्ध में पटने के लिए कुछ सीक्रेट्स चाहिए दो लोगो के बीच में- और यहाँ  हम दोनो के बीच वहीं नहीं है- एकदम खुली पुस्तक हैं  हम दोनो एक दूसरे के लिए”। “हुम्म”, उसने धीमे से कहा। “और ये मित्रता क्या होती  है ?” उसने पूछा । “और ये प्रेम, और रोमांस”? मेरे शब्दों के मीमांसा करने के गुण से वो इतना परिचित जो थी । “क्या मालूम भाई ,” मैंने कहा । “प्रेम हुआ हो तब तो बताऊँ । और रोमांस ? मेरे जैसे भावना शून्य , इमोशनलेस  व्यक्ति के लिए तो उसका अनुभव असंभव ही है । आई ऍम अ पर्सन ऑफ़ रीज़न नॉट ऑफ़ इमोशन्स, यू नो सो वेल। लेकिन अब तुमने विषय छेड़ ही दिया है तो मेरे ख्याल से यह कहा जा सकता है कि ‘प्रेम’ बस होता है, बिना भावाभिव्यक्ति के भी उसका अस्तित्व है 'रोमांस' में उसका परिलक्षण , उसकी अभिव्यक्ति होती है; और यह प्रकटन, यह अभिव्यक्ति किसी व्यक्ति की केवल कल्पनाओं से ही सीमांकित हो सकती है - लिमिटेड ओनली बाई वन्स इमेजिनेशन , यू नो” । “मैं समझी नहीं”। "एक उदाहरण देता हूँ । शॉ की ‘कैंडिडा’ पढ़ा है न तुमने ?  पति-पत्नी प्रेम तो करते हैं एक दूसरे से पर जब कभी वो एक्सप्रेस किया जाता है शब्दों में , ऐक्शन्स में – जैसे कोई सरप्राइज गिफ्ट , कैंडल लाइट डिनर – तब रोमांस का प्रवेश होता है । रोमांटिक लम्हा उस अनिर्वचनीय प्रेम को महसूस करा जाता है । प्रेम आपके वातावरण में रचा बसा तो रहता है परन्तु आप उस से अनभिज्ञ रहते हैं। कुछ वैसे ही जैसे पढ़ाई में डूबे रहने पर कमरे में बज रहे रेडियो कि उपस्थिति का एहसास तब तक नहीं होता जब तक की कोई उसे बंद न कर दे या, उसके ट्यून में परिवर्तन- व्हिच एक्चुअली जोल्ट्स यू तो कॉन्शअस्नेस ऑफ़ इट्स बीइंग” । “और मैत्री ?” उसने पूछा। “प्रेम पोजेसिव होता है , मित्रता नहीं । मैत्री वहाँ है जहां हम अपने सभी मनोभावों को बिना किसी वर्जना के, हिचकिचाहट के और, शर्म के दुसरे के समक्ष प्रकट कर सकें , शेयर कर सकें।  प्रेमी यह रिस्क नहीं मोल सकता कि उसके किसी वाक्य से, किसी कृत्य से प्रेम मंद पड़ जाय । मैत्री ऐसी किसी आशंका से मुक्त रहती है” । लेकिन प्रेम के लिए तो कवियों ने इतने कसीदे गढ़े हैं सदैव से”? “कवियों ने न? क्योंकि वो दिल से सोचते हैं । लेकिन मालूम है अगाथा क्रिस्टी जैसी क्राइम पर लिखने वाली लेखिका ने क्या कहा है ‘नेमेसिस’ में – 'Love! One of the most frightening words there is in the world. Love...' “, मैंने मुस्कराते हुए कहा  “यहाँ तक कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी अपने निबंध में यह माना है कि समर्पण श्रद्धालु की विशेषता है, प्रेमी की नहीं” ‘‘पता नहीं यार, ये तुम्हारे टर्म्स और व्याख्या ! इमोशन्स, प्रेम, मैत्री, रोमान्स...! साहित्य और समालोचना पढ़ते पढ़ते तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है – चलो चला जाये , हो गयी आज यहाँ की पढाई’’

  अरे! ये क्या, साढ़े छः बज गये, अब तो उठूं। आखिर ठीक होगा आज उसको विश करना? उन वर्षों में तो मध्यरात्रि  पर ही विश कर दिया करता था। परन्तु आज इतने वर्षों बाद! वो तो इस फेसबुक, ह्वाट्सऐप के जमाने में अचानक दो तीन वर्षों पहले पता लगा कि कहाँ है,  कितने बड़े बच्चे है, नानी दादी तो नहीं बन गयी है, वरना कहाँ  मालूम चलता। फिर उसका नम्बर भी तो तभी मिल गया था परन्तु  तब भी शायद दो चार बार ही तो संदेशों का आदान प्रदान हुआ था – नितांत औपचारिक , जैसे नव वर्ष पर या किसी त्यौहार पर बधाई। तब ये आज अचानक यह याद क्यों? विश करूं या न करू? अरे यह तो हैमलेट की वो soliloquy हो गयी- &^^to be or not to be विश करूं और कोई रिस्पान्स भी न आये तो बहुत अखरेगा। उस दिन के बाद तो कभी इस तरह अपनेपन से विश किया भी नहीं। ^^Wish you a lovely wedding** ही तो थी वो अंतिम परितप्त विश।

   कितने खटाश के दिन थे। गलती भी मेरी ही थी शायद- नौकरी की रेस में बारम्बार असफलताओं से उत्पन्न अवसाद शायद मैत्री पर भारी पड़ रहा था। और फिर उसका विवाह का तय हो जाना। यद्यपि वो अप्रत्याशित भी नहीं था। आखिर उसके पसंद से वह विवाह हो रहा था और मैं उस से अनजान भी नहीं था । परन्तु यह अचानक ही क्यों सब खराब लगाने लगा? लगा कि एक मित्र खो रहा हूँ। ऐसा क्यों लगा? मैत्री तो स्वार्थ रहित होती है। वो पोजेसिव तो होती नहीं। हाँ  प्रेम अवश्य पोजेसिव  होता है। वो नहीं चाहता बांटना।  उसे चिन्ता होती है कि वह हर न लिया जाय। तो क्या यह मैत्री नहीं थी? क्या इसलिए उसका जाना खराब लग रहा था- इतना खराब कि वर्षों की मैत्री मुझे खट्टी, बल्कि कसैली लगने लगी थी। घर आना जाना भी कम हो रहा था, साथ घूमना भी। विभिन्न विषयों पर गर्म बहसें, जो कभी झगड़े जैसा रूप ले लेती थीं , रुक गयी थी । फोन पर घंटों कि जगह मिनटों ने ले ली थी। यद्यपि आज सोचता हूँ तो लगता है कि यह परिवर्तन एक तरफ़ा ही था, वो तो पहले की तरह ही थी – प्रतिदिन की छोटी–छोटी बातों को साझा करना, सिविल सर्विसेज के आगामी साक्षात्कार के लिए टिप्स देते रहना और, पढाई के लिए डांटते रहना। परन्तु, मेरे व्यवहार और शब्दों में ताने और उलाहने परिलक्षित होने लगे थे-अनायास। या फिर यों कहें कि वह सब कहना और करना जो अब तक सरल हास्य और विनोदपूर्ण लगा करता था एकाएक व्यंग और कटाक्ष सा  प्रतीत होने लगा । आखिर शब्द और क्रिया की प्रकृति या अर्थ  संबंधों के परिप्रेक्ष्य में ही तो निर्धारित होता है ।

खैर, लेकिन आज क्यो? उठूं भी, अब आज तो हो चुकी जॉगिंग, इस स्वप्न और गतिमान दिवास्वप्न के चक्कर में। क्या सोचेगी मुझे इतने वर्षों बाद विश करने पर। मैत्री सम्बन्ध तोड़ने में मैं ही मुख्य दोषी था- अब लगता था। लेकिन क्या करूं शायद परिस्थितियां ही ऐसी थी। यदि विश के रिस्पान्स में धन्यवाद भी न दिया उसने तो बहुत बुरा लगेगा। सम्बन्ध समाप्त हो गये है- इस तथ्य पर मुहर लग जायेगी- जीवन के इस मुकाम पर। लेकिन यह भी तो सत्य है कि जीवन ही अब कितना बचा है? कुछ वर्षों में सेवानिवृत्ति , सुबह-शाम की सैर और, पौत्र पौत्री की चक्कलस। कुछ ही सम्बन्ध तो बनते हैं जीवन में जो लगता है स्वार्थ रहित थे- निश्छल थे, उन्हें एकनॉलेज करने में हर्ज क्या। ‘‘ अरे उठना नहीं है”, पत्नी ने रजाई खीचते हुए कहा और,  हो गयी जॉगिंग!’’ के प्रेमासिक्त ताने  के साथ बगल की टेबल पर  चाय का कप और अखबार रखा । हाथ में ये फोन लेकर सोये थे क्या आज”? ‘‘अरे कुछ नहीं, एक पुराने मित्र को बर्थडे विश करने जा रहा था। और मैं ह्वाट्सऐप पर टाइप करने लगा- हैप्पी बर्थडे’ - इस इन्तजार के साथ कि प्रेषण के बाद जल्द वो दो टिक नीले हो जाये।
                                           डॉ स्कन्द शुक्ल



Friday, April 28, 2017

Karela/ करेला - Published on the Literaray page 'punarnava' of Dainik Jagran




करेला


'करेला'! कहीं से एक तेज़ आवाज आई  और, अचानक ही, सड़क पर तूफ़ान सा आ गया ।   तुरंत ही उसने रिक्शे को बायीं ओर मोड़ा, किनारे रोकते हुए  हैंडल पर लटकते रस्से के छल्ले को ब्रेक पर  सरका कर  लगाया  और, जब तक हम बच्चे कुछ समझ  पाते , एक ईंट का अद्धा उठा कर उन  भागते दो लड़कों की ओर दौड़ कर फेंका  जिधर से शायद वो आवाज़ आयी थी। कुछ क्षणों के लिए  सड़क पर चलते लोग और वाहन थम से गये, पर थोड़ी  ही  देर मेंवातावरण में हंसी के  साथ सब कुछ सामान्य  हो गया ।
वो गुस्से में  बुदबुदाते हुए वापस लौटा, रस्सी के छल्ले को ब्रेक पर से वापस हैंडल पर खिसकाते हुए रिक्शे की  ऊंची कड़ी  सीट पर बैठा और, स्कूल की ओर बढ़ चला ।
'क्या हुआ था?' हमने थोड़ी देर बाद पूछा । 'कुछ नहीं', उसने तेज़ी से पैडल मारते हुए जवाब दिया । ऐसा लगा कि उसका सारा  गुस्सा  उन पैडलों पर निकल रहा था ।
वह  था  मज्जी, हमारा  रिक्शेवाला जो हमे रोज़ स्कूल लाता - ले जाता था । नाटा कद, पीठ पर कूबड़, दबा रंग, सिर पर अस्त व्यस्त घने बालों वाला यह व्यक्ति प्रथम दृष्टया  कतई आकर्षक नहीं था ।
'क्या आपको कोई और नहीं मिला?', माँ ने पिताजी से तुरंत ही धीरे से पूछा था । 'मैंने उसके बारे में सब पता कर लिया है, अच्छा और भरोसे के लायक है और, यहीं पास में, एक फर्लांग पर रहता है’, उन्होंने आश्वस्त करते हुए कहा ।
'भैया चलो'!  अगली सुबह एक तेज़ पुकार आयी - ठीक उतने  समयजब  उसने आने को कहा था । जिस स्नेह से उसने बस्ते को अपने कंधे पर लेते हुए, पहली बार किसी अजनबी के साथ घर से बाहर निकल रहे पांच वर्ष के बालक की उंगली पकड़ी और बहलाते हुए रिक्शे की ओर बढ़ा, माँ का उसको लेकर सारा संशय  मिट गया । हौले  से  उसे  उठाकर उसने  रिक्शे  पर बैठाया और एक नए संबंध का सूत्रपात हुआ 
मज्जी  का  व्यवहार सभी बच्चों के प्रति अभिभावक का ही होता था  । स्वयं अपढ  होते हुए हुए भी परीक्षा के समय वो यह सुनिश्चित करता हुआ रिक्शा चलाता जाता था कि सभी  बच्चे अपने पाठ को दुहरा रहे हैं  । क्या मजाल कि कोई अनुचित  शब्द किसी के मुंह  से निकल जाए; और यदि ऐसा हो गया तो उसकी डांट के साथ साथ घर तक बात पहुँचनी भी निश्चित होती थी।
 रिक्शे की गद्दी  के नीचे का स्थान सभी  बच्चों  के लिए कौतूहल का केंद्र होता  था । गद्दी  उठाने पर वो बिलकुल दादी कि संदूकची जैसे लगता था । उसमें उसके  काम की ढेरों वस्तुओं  के साथ –साथ  इमली, अमरख, अमरुद, कच्ची अमियाँ जैसी बाल्य - रूचि  की चीज़ें  भी होती थीं ।  रिक्शे के बच्चों को होली पर  उसके द्वारा  तैयार  विशेष गाढ़े रंग, और दिवाली पर चुटपुटिया बजाने के लिए नट-बोल्ट से बने  यंत्र की प्रतीक्षा रहा करती थी । उसी संदुकची-नुमा जगह  में  एक बड़ी सी , पुरानी सी बरसाती भी रहती थी ।  बारिश में  प्रायः वह उस बरसाती से रिक्शे के उस भाग को तो ढँक देता था जहां बच्चे  बैठते थे और स्वयं भीगते हुए रिक्शा खींचता चलता था । असल में पैसों की कमी उसे अपनी सुविधाओं पर व्यय करने से रोकती जो  थी । 
उस रविवार तो वो बिलकुल बदले स्वरुप में था! करीने से कढे बाल, साफ़ और प्रेस किये कपड़े और, मुख पर एक चमक । वह  माँ से कुछ पैसे उधार लेने आया था । उसकी सगाई थी उस दिन, उसने शर्माते हुए बताया ।  
विवाह के कुछ ही दिनों बाद वो अपनी पत्नी को  माँ से मिलवाने ले आया । तीखे नैन-नक्श, साफ़ रंग और, दीप्तिमान आँखे - मेरी बाल-दृष्टि को भी वो भली लगी। जाड़े की उस दोपहर  महिलाओं की बात चीत का विषय वही रही । 'इतनी सुन्दर ! ये मज्जी जैसे व्यक्ति से विवाह को तैयार कैसे हो गयी !', उनमे से किसी एक की यह आश्चर्य-सिक्त अभिव्यक्ति  और, उस पर अन्य सभी महिलाओं का सहमति का भाव, उस विशद चर्चा का सार रहा ।
मज्जी ने रहने की जगह बदल दी । पुरानी जगह एक  नव-विवाहित जोड़े  के लिए उपयुक्त  नहीं थी । यह एक बड़े से खाली प्लाट के एक कोने पर उधड़ा-उजड़ा  सा, बिना रंग-रोगन, प्लास्टर -विहीन एक कमरा था । कुछ ही समय में वह उजाड़ सी जगह, जहाँ तब तक  मात्र एक अमरख का पेड़ था , एक छोटे से बगीचे  में परिवर्तित हो चली  थी । फूलों और मौसमी सब्जियों की  क्यारियों के साथ -साथ एक बकरी और एक पिल्ला , जिसे वह किसी कुड़ाघर के पास से सुअरों से बचा के लाया था , उस अदनवाटिका के अंग थे ।
उनकी पहली संतान हुई और मज्जी कि प्रसन्नता का ठिकाना न था । उसने आ कर माताजी को शुभ समाचार सुनाया और उन्होंने मोहल्ले की अपनी सहेलियों को । सुनकर किसी ने यह आशा व्यक्त की कि यदि वह बच्चा अपनी माँ पर जाय  तो कितना ही अच्छा हो  और सभी ने उसका समर्थन किया 
          यद्यपि अब मैं  साइकिल से स्कूल जाने लगा था , फिर भी कभी कभी उसके पास चला जाता था । अक्सर तब, जब साइकिल कि चेन में ग्रीस लगवानी होती थी या फिर अमरख - इमली आदि  खाने की इच्छा हो आती थी । परन्तु वो हमारे यहाँ नियमित रूप से आता रहता था । सप्ताह-दस दिन में एक बार तो अवश्य ही ।
समय  के साथ परिवार में दो  बच्चों की वृद्धि और हुई और, स्वाभाविक रूप से खर्चों में भी । बढ़ती उम्र के साथ मज्जी की शारीरिक श्रम की क्षमता भी कम हो रही थी  और, आमदनी भी । एक दिन जब वो मेरी माँ से अपनी समस्याओं को बता रहा था तो उन्होंने सलाह दी कि क्यों नहीं वो अपनी पत्नी से कहता कि वो भी कुछ घरों में कुछ काम पकड़ ले । 'अरे नहीं माताजी ! उसने भी  हमसे एक-आध बार यह कहा, लेकिन मैंने ही मना कर दिया... मैंने कह दिया है  कि अभी मेरे अन्दर उन सभी को खिलाने की ताकत है ।... ये दुनिया बहुत अच्छी नहीं है, माताजी! उसे घर- घर चौका-बर्तन नहीं करने भेजूंगा ।उसने उत्तेजित स्वर में बोला था ।
उम्र के साथ प्राथमिकताओं और रुचियों में परिवर्तन के साथ-साथ  न जाने क्यों वहां का वातावरण  अब पूर्व की भाँति आकर्षित करता हुआ महसूस नहीं होता था । पंहुचने पर उसकी पत्नी का तत्काल अन्दर चला जाना या खिड़की  और दरवाजे को परदे से ढँक लेना- ऐसा पहले तो नहीं होता था ! अब किसी आगंतुक की उपस्थिति मानों उसे भारी जान पड़ती थी ।

उसका मेरे घर आना भी काफी कम हो चला था । फिर भी, होली, दीपावली की त्यौहारी और ईद पर उसको कुछ पैसे देने के लिए उसको बुलवा भेजना मेरी माँ को कभी नहीं भूलता था । वो अभी भी पुराने, पहनने योग्य कपड़ों से  बर्तन वाले से बर्तन नहीं लेती थीं, बल्कि उसके लिए  रख देती थी । समय बीतने के साथ वह  और दुर्बल और बीमार ही होता जा  रहा था । बीड़ी पीना छोड़ने की सलाह पर वो मुस्करा कर बस कंधे उचका देता था, यह कहते हुए कि 'बस एक ही तो यह  नशा है । बड़ी राहत देता है ।'
रिक्शा खींचने  की ताकत नहीं रही थी अब उसमें । अपना रिक्शा उसने किराये पर उठा दिया था । उसकी पत्नी भी आस-पास के घरों में कुछ काम करने लगी थी। यह उसने एक दिन बहुत दुःख के साथ बताया ।
अंतिम बार उसे घर आये कुछ एक माह हुए थे कि एक दिन मालूम चला कि मज्जी नहीं रहा। 'उसे टी.बी. हो गया था', पिताजी ने बताया । मुझे दुःख हुआ । सोचा एक बार उसके घर हो आऊँ, देख लूँ कि शायद परिवार को किसी प्रकार कि सहायता की आवश्यकता हो ।
लेकिन जब मैं उसके घर जा पाया तब कुछ सप्ताह बीत चुके थे।  वहाँ चारो और सन्नाटा था। फूल और पौधे सूख गये थे। कहीं कोई हलचल नहीं थी। वे दो जानवर - बकरी और कुत्ता - भी  नहीं दिखे। पास जा कर देखा तो दरवाजे पर ताला मिला। मैं  वापस जाने के लिए उस प्लॉट से बाहर निकल ही रहा था कि एक बुजुर्ग से व्यक्ति को अपनी ओर देखते हुए पाया। ध्यान से देखने पर उन्हें पहचान गया। वो यहीं पड़ोस में रहते थे।
 'क्या आप मज्जी से मिलने आये थे ? ...आपको मालूम नहीं, ....वो तो गुजर गया कई दिन पहले ' - वे बोले। 'हाँ मैंने सुना था' - मैंने कहा। 'सोचा देख लूँ परिवार किस हालत में है' - मैंने आगे जोड़ा ।  'वो लोग तो कहीं चले गये सब सामान लेकर  ...शायद अपने गाँव'- उन्होंने बताया। 'ओह ! आखिरी समय बहुत तकलीफ में तो नहीं बीते उसके? टी.बी.थी उसे? ...अभी बहुत उम्र भी तो नहीं थी ...लेकिन बहुत लापरवाही किया शायद उसने अपनी सेहत के साथ?', मैंने चलते-चलते प्रश्न किया।  'हाँटी.बी. ही थी ...काम और कमाई दोनों ही बंद हो गयी थी इधर।  ...लेकिन सच बोलूँ तो केवल इतना ही नहीं था ...टी.बी. से तो वो अब जा कर मरा ...उसकी मौत तो शायद बहुत पहले हो गयी थी।' मैं विस्मय से उनकी बात सुन रहा था।'मैं तो कहता हूँ कि उसे इतनी सुन्दर महिला से विवाह  ही नहीं करना  चाहिए था।' दुनियावी अनुभव और अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ बात समाप्त कर वे आगे बढ़ गये।
-      डॉ स्कन्द शुक्ल
              24 एम. आई. जी., म्योराबाद आवास योजना (निकट नेहरू युवा केंद्र, कमलानगर),                                                                                                                          इलाहाबाद
published in Dainik Jagran date 17-4-17