Monday, March 29, 2021

School bells to ring again (Published in TOI Lko edition 01/03/2021 )

 School bells to ring again

https://timesofindia.indiatimes.com/city/lucknow/primary-school-bells-to-start-ringing-again-today/articleshow/81264102.cms


Whenever I saw my sons settling themselves before the computers for their lessons with a listless ‘present Ma’am’, that ritual chant of the whole class in unison of ‘good morning, teacher’ would echo from the recesses of my memory. Yes, in unison. Not only in wishing teachers, but also, in accepting punishments. Even when we stood in the assembly condoling a death!

I still don’t understand why, as the command was given to stand in attention for two minutes, did a smile begin somewhere, turned into a giggle as it travelled from row to row, and by the time the two minutes ended, made someone or the other burst into laughter. All of it was inexplicably spontaneous and linked everyone together.

School sure was fun time. It was formed of friendships, games, pranks and, a bond with teachers in spite of punishments at their hands- corporal ones at that! And, at this age, when we are completing half a century in our lives, we can proudly say that all the relationships have lasted so long.

The fun began as soon as we stepped out of our homes for our schools.

Games like ‘raja-mantra-chor-sipahi’, antakshri, giving a push together to the rickshaw on steep slopes and, unending chats marked our rickshaw-rides to school.

Cycling to school was more exciting. It gave us a sense of freedom and inculcated confidence. Pedaling in groups, we raced against each other, rode double (even triple at times) if someone didn’t have a bicycle and, lent a hand or money if a friend’s cycle developed a snag.

Help was always at hand if one forgot to wear his belt or tie to school during uniform inspections. As one stood in queue, the particular item would reach him when his turn came from someone who had had got himself checked by then, or one whose turn was to come a wee later.

Such was the bond in the class that even the threat of mass punishments could never make us spill out the names of the pranksters when the mischief got discovered.

Pilfering of food from others’ lunch-boxes was another fun-filled activity! Whatsoever goodies were packed by our moms in our tiffins, it was always the others’ that one went after.

The reverie can go on and on…And I am sure that all school-lives must’ve been similar to ours, until this school session began in April 2020.

The ‘class monitor’ gave place to the ‘computer monitor’. Pens and copies became redundant. The discipline of schedules went for a toss and snoozing in class lost its charm.

The change was troubling. School uniforms and the classrooms are a great leveler. The online classes aren’t. Besides the issues of availability of laptops, smart-phones and, internet connectivity, a grave issue is the exposure of the child’s home-environment to all.

Arnold’s lines- ‘in the sea of life enisled…/ We mortal millions live alone’ reverberate when I see the keyboard-monitor education. It can create automatons but cannot inculcate life-skills and develop a child into an emotionally mature human being.

Schools are meant to make us realize that we are social animals with traits of empathy and a sense of community. We are made to learn unconsciously the skills of working as a team whether playing a sport or working on a project. As we resolve a fight during a break, we learn the skills of conflict resolution. We develop fellowships that help us sail the crests and troughs of life.

Thankfully, the schools are opening their gates by and by to welcome back the students, and this generation of students shall also grow with its own memories and relationships.

--Dr. Skand Shukla

https://timesofindia.indiatimes.com/.../primary-school.../ 

Tuesday, December 8, 2020

मास्क - एक कविता

 

मास्क


मास्क अच्छे हैं।

छुपा लेते हैं

सफ़ेद होती मूंछों को

होठों के ऊपर

उभर रही झुर्रियों को;

मास्क अच्छे हैं।

 

छुपा लेते हैं

बेमन दी जाने वाली

झूठी मुस्कानों को

या देखकर कुछ ऐसा

इच्छा हो मुँह बिचकाने को;

मास्क अच्छे हैं।

 

छुपा लेते हैं

बेबस चेहरों पर

खरोंच के निशानों को

निढाल पसरे हुए

मजबूर अरमानों को;

मास्क अच्छे हैं।

 

छिप पाता यह सब

क्या सचमुच?

या फिर अगाध

गहराईयाँ आँखों की,

प्रतिध्वनित करती रहतीं

सच को?

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Published in 'Amar Ujala Kavya' link - 

https://www.amarujala.com/kavya/mere-alfaz/skand-shukla-mask?fbclid=IwAR0nVVXgdIthWOZo6kkKSeleBiAkbr1BFvSnJhDJrXCyZARJlQKaDuE0f0Y

Sunday, October 11, 2020

 

शीत के बाद बसंत

 

जाड़े की शामें हमेशा से ही उसे मनहूस लगती रही हैं। गर्मियों की तरह सूरज धीरे धीरे नहीं उतरता, कि लोग धीमे धीमे ठंडी होती सांझ का आनन्द उठा सकें। वह तो  दिखते दिखते धुप्प से अचानक ही ढुक जाता है, और तुरंत ही, हो आये अँधेरे के साथ, ठंडी, अन्दर तक बेध देने वाली गलन उस मुलायम सी गरमी को न जाने कहाँ भगा देती है। तब, ‘लव सॉंग ऑफ़ प्रूफ्रोक’ में एलीअट की वह चौंका देने वाली पंक्ति कितनी सटीक लगती है – ‘व्हेन द इवनिंग इज स्प्रेड आउट अगेंस्ट द स्काई/ लाइक अ पेशेंट ईथरायिज्ड ऑन द टेबल’।

अब तो बसंत के आगमन के साथ ही ये शामें खुशनुमा होंगी कुछ।

निम्मी पार्क में बैठी रोमी का इंतज़ार कर रही थी। थोड़ी देर में धुंधलका छाने वाला था। बस कुछ ही देर में खेल रहे बच्चे अपने अपने घरों को चले जायेंगे। कुछ कुछ अपार्टमेंट्स से उन्हें अन्दर आने की आवाजें आने भी लगी थीं- ‘अब अन्दर आओ, होमवर्क करना है’, ’ठण्ड बढ़ रही है, जल्दी आओ’... । पार्क में स्थित उस बड़े से पेड़ पर चिड़ियों की फौज वापस लौट रही थी और चिड़ियों और उनके चूजों के मिलन का शोर बढ़ता ही जा रहा था।

टाइम कटे भी तो कैसे? पढ़ने की हॉबी तो है, लेकिन कितना पढ़े? और जिसे पढ़ने की लत हो, वह टी.वी. को नहीं झेल सकता? सोशलाइज़ेशन तो कितने वर्ष हुए समाप्त ही हो गया। आखिर जिसके घर जाओ वह अपने बच्चों में व्यस्त। और फिर मिलने जुलने वालों की बातों और आँखों में हमेशा वही सवाल। कभी स्वाभाविक जिज्ञासा के रूप में और कभी संवेदना स्वरुप। नौकरी भी छोड़नी पड़ गयी। आखिर महीनों महीनों की छुट्टियां देता कौन जो माँ बनने के प्रयास में उसे आवश्यक होती थीं। आई.वी.एफ., मोलर प्रेगनेंसी, मिसकैरिज... जैसे शब्द तो पढ़ाई लिखाई के दौरान सुने-पढ़े थे। क्या पता था कि उनसे इस तरह रूबरू होना होगा किसी दिन। तभी उसे पैरों के पास कुछ गुदगुदी से लगी, जैसे किसी ने छुआ हो। तन्द्रा टूटी और उसने अचकचाकर बेंच के नीचे झांका।

‘ओह! तो यह तुम हो!’ भय मुस्कान में बदल गया। वह एक प्यारा सा पिल्ला था। गोल मटोल सा ढनंगते उसके पैरों से चिपट रहा था। तभी उसकी माँ आ गयी, हौले से दांतों से उसे पकड़ा और सुरक्षित स्थान पर ले जाने लगी।

वह फिर से बैठ गयी। खाना बनाने का कितना शौक था उसे। वह भी, नए नए व्यंजन इजाद करने का। और, रोमी हो या उसके सास-श्वसुर, सभी खाने के शौक़ीन। लेकिन अब? अच्छा नहीं लगता जब पड़ोस की हम-उम्र महिलाओं को कहते सुनती है – ‘अब इन बच्चों को कौन सा व्यंजन बना कर दें? टिफ़िन खत्म ही नहीं करते ये कभी’। ‘काश, ईश्वर ने अवसर तो दिया होता मुझे’!

उन संत्रास भरे प्रयासों के दौरान कितनी ही बार तो ख्याल आया कि किसी बच्चे को ही गोद ले लें। कुछ करीबी शुभेच्छुओं ने यह भी कहा कि गोद लेना बड़ा शुभ होता है। अक्सर ऐसा करने पर कंसेप्शन भी सफल हो जाता है। लेकिन यह निर्णय इतना आसान तो होता नहीं न। परम्पराओं, संस्कारों में बंधे हम, कैसे स्वीकार लें किसी को? कितने तो प्रश्न उमड़ते थे जब भी इस पर रोमी से बात हुयी। किसका होगा वो? क्या बड़ा होने पर अपना मानेगा हमें? आखिर अभी हमारी उम्र ही क्या है? अभी तो कुछ एक वर्ष और हैं कि अपने के लिए प्रयास कर लें। गोद तो कभी भी ले लेंगे।

यह भी सोचा कि किसी रिश्तेदार से ही उसका बच्चा गोद ले लें। इस से कुल आदि के प्रश्न और संशय से मुक्ति तो रहेगी। लेकिन फिर दूसरी बाधाएं। किस से कहो। कैसे प्रस्ताव रखो। पुराने ज़माने की तरह अब कई कई बच्चे तो होते नहीं परिवारों में, कि किसी एक को दुसरे को दे दे। न्यूक्लिअर फैमिली के समय में वैसे भी सब नियोजित ही होता है।

बस, इसी सब में बारह वर्ष गुजर गये । अब तो आदत पड़ गयी है। अब अवसाद है भी तो महसूस नहीं होता ।

रोमी आ ही रहे होंगे। निम्मी ने उठने का उपक्रम किया ही था कि अचानक पीछे से आवाज़ आयी – ‘अरे हम लोग को देख कर चल दी क्या?’ और फिर एक मधुर सी हँसी। उसने पीछे देखा तो उसके टावर के ग्राउंड फ्लोर पर एक अपार्टमेंट में रहने वाले बुजुर्ग दम्पत्ति – चोपड़ा अंकल और आंटी थे।

‘अरे नहीं आंटी’, कहते हुए उसने लपक के दोनों के पैर छुए। चोपड़ा अंकल व्हील चेयर पर थे और उनकी पत्नी उन्हें पार्क की सैर कराने ले आयी थीं। उसने उनके हाथ से व्हील चेयर की हैंडल ले ली और उस छोटे से आर्टिफीसियल पॉन्ड के पास उनके पसंदीदा स्थान की ओर चली।

चोपड़ा जी पिचहत्तर के कुछ ऊपर के थे और उनकी पत्नी उनसे दो-तीन वर्ष कम। सरकारी अधिकारी रहे थे और कई उच्च पदों पर कार्य करते हुए पंद्रह वर्ष पूर्व सेवानिवृत्त होकर इसी शहर में बस गये थे। अधिकांश सेवा काल  उनका इसी महानगर में बीता था। दोनों संताने भी यहीं हुयी थीं और स्कूली  शिक्षा ग्रहण की थीं। भाग्यवान व्यक्ति थे। दोनों ही बच्चे उच्च पदस्थ। एक तो अमरीका में किसी बैंक में कार्यरत था। उसने अमरीकी नागरिकता भी ले ली थी। और दूसरा, भारतीय वन सेवा का अधिकारी था जो नार्थ-ईस्ट के किसी काडर में तैनात था। दोनों के ही दो दो बच्चे थे। सुन्दर और गुणवान। ऐसा सुना था। क्योंकि किसी को याद नहीं कि इन हाल के वर्षों में उनमें से कोई अपने बाबा-दादी के पास मिलने आये हों। नौकरी की शुरुआत में तो बेटे बहू साल में एक-आध बार आ जाते थे। होली पर कोई और, दीपावली पर कोई। लेकिन समय के साथ, नौकरी की व्यस्तताएं और बच्चों की पढाई उन भेंटों को कम करती गयीं। अब तो स्काइप और फेसबुक के माध्यम से ही उनमें उत्तरोत्तर वृद्धि का पता चलता था।

‘बस-बस, यहीं रोक दो निम्मी’, अंकल ने कहा। चोपड़ा आंटी और निम्मी उनके बगल में बैठने के लिए रखे रॉक्स पर बैठ गये।

‘शीत ने इन पौधों की पत्तियाँ ही समाप्त कर दी हैं। ठण्ड कम हो तो यह वापस हरी हों’, निम्मी ने पॉन्ड के पास के लगे फूलों के पौधों की ओर देखते हुए कहा।

‘आप लोग यहाँ की यह भीषण जाड़ा क्यों झेलते है? इतनी बढ़िया जगहों पर आपके बेटे हैं, वहाँ कभी नहीं जाते आप लोग?’, उसके मुँह से बरबस ही निकल गया।

‘हाँ, सुना तो हम दोनों ने भी है कि वे दोनों ही बड़े बड़े खूबसूरत बंगलों में रहते हैं। काम करने वालों और सुविधाओं की कोई कमी नहीं है’, चोपड़ा अंकल ने बोला। ‘लेकिन मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता होती है समाज की, कोई बोलने-बतलाने वाला, कोई जिस से वह शेयर कर सके अपने अंतर्मन को। और वह इसकी जीवन यात्रा में कोई भी हो सकता है। उसके लिए विधिक और सामाजिक रूप से परिभाषित संबंधों की परिधि ही आवश्यक नहीं। वह सब यहीं है। आखिर जीवन का अधिकांश समय यहीं बिताया है हम दोनों ने, तो संबंध भी तो यहीं हैं’।

तभी आंटी ने बोला, ‘अरे निम्मी, व्हाट्सएप्प पर मेरी नयी डीपी नहीं देखी तुमने?’

‘हाँ आंटी, दोपहर में नज़र पड़ी। पूछने ही वाली थी। फिर दादी बनी हैं क्या आप! बड़ी प्यारी से बिटिया की फोटो लगी है उस पर’।

‘नहीं जी। तुम तो जानती हो न कि कॉलोनी के पास उस अनाथालय में हम लोग जाते रहते हैं अक्सर। बस वहीं पर थी यह। अनाथालय की सिस्टर ने बताया कि गेट के पास कोई एक कम्बल में लिटा हुआ छोड़ गया था। सचमुच बहुत प्यारी है वो। कल ही तुम्हारे अंकल का जन्मदिन भी है न। वहीं मनाएंगे। और इसके लिए तो आज दोपहर इन्होंने खूब सारे सामान विशेष रूप से लिए, जैसे अपने ही घर कोई आया हो’

‘अरे भाई, अपने घर में ही कोई आया हो, यह सब मानने की ही तो बात है। मन ने मान लिया कि अपना है तो बस हो गया’, अंकल ने ठठाकर कर हँसते हुए उत्तर दिया।

निम्मी को अन्दर कुछ हो रहा था। जैसे वह अचानक किसी निर्णय पर पंहुचने चाहती हो। तुरंत।

अचानक उसने अपना फोन अपने हैण्ड-वॉलेट से निकाला और रोमी को मिला दिया।

‘जल्दी आओ थोड़ा।‘

‘कुछ विशेष?,’ उधर से आवाज़ आयी।

‘हाँ। विशेष। एक छोटी सी बिटिया के लिए शॉपिंग करनी है, खूब सारी। आखिर कितनी भी विकट ठण्ड पड़े, बसंत तो आयेगा ही न।’

चोपड़ा दंपत्ति उसके मुख पर पसर आयी उस अभूतपूर्व शांतिमय-कान्ति को स्पष्ट देख रहे थे।

 

(डॉ स्कन्द शुक्ल)

24 एम.आई.जी. म्योराबाद आवास योजना , कमलानगर,

प्रयागराज

 दैनिक जागरण और नयी दुनिया के साहित्यिक पृष्ठ पर प्रकाशित (12/10/20) लिंक - https://epaper.naidunia.com/epaper/image-12-Oct-2020-edition-bhopal-10-78866.html?fbclid=IwAR2037oQ88VSEovaZ7crlVTkwYlSYkHCUW2SG2Qa7ncIviswlT3mIdFwlGo

 

Tuesday, March 3, 2020

एक रुपया - पुनर्नवा दैनिक जागरण - 14-01-2020


             एक रुपया

वाह!  बिलकुल अपने नाम के अनुरूप, ग्रैंड! मॉल रोड के ऊपर स्थित इस स्थान से शिमला के खूबसूरत पहाड़ों की हरीतिमा क्या खूब दिख रही थी। कुछ पल पहले तो लग ही नहीं रहा था कि यह खड़ी चढ़ाई समाप्त भी होगी। और फिर अचानक उस पोर्टर का स्वर – ‘इस सीढ़ी पर चढ़िए’, और एक लोहे की साधारण सी सीढ़ी की ओर उसका मुड़ना। लगा कि गलत होटल का चयन हो गया। पता नहीं किसने सुझाया था इसे कि वह एक हेरिटेज भवन है और कभी लार्ड विलियम बैंटिक का कासल था।  परन्तु, प्रवेश द्वार से घुसते ही उस विराट कई मंजिला इमारत ने मन के संशय को समाप्त कर दिया। चिनार और देवदार के विशाल वृक्षों से आच्छादित उस सुन्दर विस्तार में जगह जगह पर बंदरों से दूर रहने की हिदायत के बोर्ड लगे थे। कुछ देर अपने सुइट में आराम करने के बाद बाहर निकल कर घूमने का निश्चय हुआ । होटल की बेदम सी चाय के कारण एक  बढ़िया चाय की जोरदार तलब भी थी। 


होटल की सीढ़ियों से उतरते ही सड़क पर ढेरों खाने की दुकानें थीं । सच तो यह है कि किसी स्थान के असली खाने को चखना- जानना हो तो स्ट्रीट-फ़ूड से अच्छा कुछ भी नहीं होता। आलू-पराठा जैसी सर्व-सुलभ चीज़ का भी स्वाद अलग अलग स्थानों पर अलग अलग ही आप पायेंगे। परन्तु उस समय तो आँखें केवल चाय की दूकान खोज रही थीं। और एक दिख भी गयी- बस कुछ कदम दूर।
बुजुर्ग से उस चाय वाले ने हमें देखते ही स्वागत भरी गर्म मुस्कान के साथ पूछा – ‘चाय? पराठे तो अभी बने नहीं हैं । उनके लिए तो अभी आटा गूंथने जा रहा हूँ।’ 

‘हाँ, बस चाय। दो कप।’ 

बच्चे अपने चिप्स के पैकेटों में व्यस्त थे।

ऊपरी सतह पर एल्युमीनियम शीट लगा हुआ एक बड़ा सा लकड़ी का बक्स- स्टोर और रसोई के काउंटर-टॉप- दोनों के ही रूप में उपयोग हो रहा था। एक ओर मिट्टी-तेल का पम्प वाला स्टोव रखा था। दूध से भरा एक बड़ा सा एल्युमीनियम का भगोना, चाय बनाने का एक पैन, एक बेलन और, पराठे सेंकने के लिए एक लोहे का तवा भी उसी पर थे। बगल में कुछ प्लास्टिक के मर्तबान थे जिनमें चाय की पत्ती, चीनी और मठरी जैसी खाने की चीज़ें थीं। कुछ डिस्पोजेबल पेपर कप, शीशे की ग्लास और शायद मठरी आदि तौलने के लिए एक तराजू। यही कुल दूकान थी।

तभी एक अप्रत्याशित वस्तु की ओर निगाह गयी – एक पिस्तौल, बिलकुल असली ! 

‘यह क्यों?’, मैंने आश्चर्य के स्वर में पूछा। ‘क्या यह खिलौने वाली है?’
‘न, बाबू’, उसने चाय के लिए अदरक कूटते हुए उत्तर दिया। 

‘बिलकुल असली तो नहीं है पर यह खिलौना भी नहीं है। इसमें से रबर वाली गोलियां निकलती हैं। इनसे हल्की चोट भी लगती है। असल में जब बन्दर गुलेल से नहीं डरते तो इसे चलाना पड़ता है।’

ऊपर होटल और आस पास की इमारतों पर लोहे की ढलुवा छतों पर दौड़ते, खेलते और आपस में लड़ते बंदरों की तेज़ आवाज़ सुनायी पड़ रही थी । ‘अरे! देखो, उधर एक है’, छोटे बेटे ने चाय वाले के पीछे चट्टान पर, देवदार के वृक्ष की आड़ ले कर हमारी तरफ देखते बन्दर की ओर इशारा किया। उन्होंने अपने पास रखी  पिस्तौल उठा कर हँसते हुए उसे देते हुए कहा, ‘इसे लो और उसकी ओर इसे दिखाओ। डरो नहीं, यह खाली है। इसका स्वाद वो सब पहले पा चुके हैं इसलिए अब इसे देख कर ही डर जाते हैं।’ 

सचमुच, पिस्तौल देखते ही वह बड़ा सा बन्दर तुरंत डाल डाल  कूदते हुए भाग गया।

चाय अच्छी थी और वह स्थल भी प्रीतिकर। उन कुछ दिनों में सुबह की पहली चाय का स्थान वही रहा।

प्रवास का तीसरा दिन। अल सुबह। सब शांत - पहाड़ की शीतल हवा में झूमते चिनार और देवदार के पत्तों, चिड़ियों के कूजन और, बीच बीच में बंदरों की चिल्लाहट के अतिरिक्त। अधिकांश पर्यटक शायद अभी अपने गर्म रजाइयों के सुखद ककून में थे, पर पहाड़ जगने लगा था। चाय वाला स्टोव जलाने के लिए उसमे पम्प दे रहा था और मेरी पत्नी और मैं दो बड़े पत्थरों पर रखे पटरे वाली बेंच पर बैठे चाय की प्रतीक्षा कर रहे थे। दूर पहाड़ सुबह की धुंध में ढंके थे। नीचे शिमला का रेलवे स्टेशन दिख रहा था । धुएं के छल्ले फेंकता और अपने हूटर से अपनी पूरी ताकत झोंक देने का अहसास कराता एक इंजन हाँफता चल रहा था। जल्द ही कालका से सुबह वाली टॉय-ट्रेन्स छुक छुक करती पँहुचने लगेंगी। मैं प्लेटफार्म पर उन कुलियों की कल्पना कर सकता था जो पर्यटकों की प्रतीक्षा में खड़े होंगे कि वे आयें तो वे उनके भारी भरकम लगेज को अपनी पीठ पर बांध कर उन खड़े पहाडी रास्तों से ऊपर पहुँचायें।

छह-सात लोगों का एक ग्रुप अचानक उस चाय के स्टाल पर पहुँचा। उनके साथ सामान देख कर यह सहज अनुमान लगाया जा सकता था कि वे लोग नीचे, स्टेशन पर, शिमला से वापस कालका जाने वाली गाड़ी पकड़ने जा रहे हैं ।

‘चाय मिलेगी?’, उनमें से एक ने पूछा ।
‘जी बिलकुल’, चाय वाले ने मुस्कुरा के जवाब दिया । ‘बस पांच मिनट लगेंगे। उन लोगों की  बन रही है, बस उसके बाद आप लोगों के लिए।’
‘असल में जल्दी है हम लोगों को’, उस युवक ने कहा और इधर उधर नज़रें दौड़ाईं कि शायद कोई अन्य दूकान दिख जाय। पर उस समय आस पास कोई भी और नहीं खुली थी ।

‘कोई बात नहीं, आप इन लोगों को पहले पिला दीजिये’, मैं अपने स्थान से ही बोला। ‘हम लोग इनके बाद ले लेंगे।’ 

मुझे लगा कि इन्हें अपनी ट्रेन पकड़नी होगी; और वैसे भी, हम उस आनंदमयी सुरम्य निर्मल निस्तब्धता में डूबे हुए अनंत प्रतीक्षा कर सकते थे।

एक हल्के से कोलाहल से मेरी तंद्रा टूटी। चाय वाले ने 500 रुपये का नोट हाथ में पकड़ा हुआ था और उन लोगों से किसी छोटे मूल्य का नोट चाह रहा था। वो कह रहा था कि सुबह का समय है और वे लोग उसके पहले ग्राहक। आखिर इतनी सुबह वह उसका छुट्टा कहाँ से दे। परन्तु उस ग्रुप में सभी ने छुट्टे पैसे अथवा छोटा नोट पास न होना बताया।

थक हार कर उसने दूकान में खंगालना शुरू कर दिया, और अंततः विभिन्न मूल्यों के नोट और सिक्कों को जोड़-जाड़ कर उस व्यक्ति को पैसे वापस किये। 

उन सिक्कों और तुड़े- मुड़े नोटों को बड़ी मेहनत से सीधा कर-कर उन सज्जन ने गिनना प्रारंभ किया ।

‘अरे! इसमें तो एक रुपया कम है अभी’, उन्होंने पूरा गिनने के बाद कहा ।

‘बाबू , कुछ देर बाद ले लीजियेगा । सब जगह ढूंढ लिए और अब इस समय तो है नहीं।’

‘अरे भाई, अब कहाँ हम लोग लौटेंगे । हम लोग तो जा रहे हैं ट्रेन पकड़ने।’

तभी चाय वाले को स्टोव के पाए की नीचे एक सिक्का नज़र आया और उसने उसे तुरंत उठा कर उन्हें दे दिया । पार्टी अपने गंतव्य की ओर रवाना हुयी।

उसी दोपहर उस स्टाल पर दुबारा जाना हुआ । 

हुआ यूँ कि उस दिन के लिए निर्धारित दर्शनीय स्थलों का भ्रमण कुछ जल्दी ही ख़त्म हो गया, तो तय हुआ कि होटल चल कर कुछ देर आराम कर लिया जाये और शाम को फिर से निकला जाएगा।

होटल के लिए उस खड़ी चढ़ाई पर चलते समय चाय की इच्छा हुयी। दूकान पर कोई ग्राहक नहीं था और उन बुजुर्ग चायवाले के स्थान पर एक बुजुर्ग महिला थीं – गोलमटोल चहरे की झुर्रियों पर पसरी हुयी उसी स्नेहिल मुस्कान के साथ।

‘क्या लेंगे?’, उन्होंने प्रेम से पूछा ।

‘हम दो लोगों के लिए चाय’, मेरी पत्नी ने कहा। 

‘जी’, वे बोलीं और चाय की तैयारी शुरू कर दी।

‘अंकल नहीं दिख रहे? दोपहर में दूकान आप ही संभालतीं हैं क्या?’ पत्नी ने पूछा।

‘अरे नहीं। असल में वो दूकान के लिए कुछ सामान लेने गए हैं, इसीलिये मैं यहाँ हूँ।’

‘तुम दोनों चाय नहीं लोगे?’ , वो बच्चों की ओर मुखातिब थीं।

‘न, हम लोग चाय नहीं पीते’, छोटे ने उत्तर दिया।

‘वाह! यह तो बड़ी अच्छी बात है। बच्चों को चाय नहीं पीना चाहिए।’ उन्होंने बच्चों से मुस्कुरा के बोला। 

काम के साथ साथ वो उनसे बात करती रहीं। वे किस कक्षा में पढ़ते हैं, कहाँ रहते हैं, आदि, आदि।

कुछ ही देर में चाय बन गयी और हमे उन्होंने दो पेपर कप पकड़ा दिए। उसके बाद सामने रखी झबिया से पेपर के बड़े से दोने में नमकपारा निकाला और बच्चों को दे दिया। ‘बस अभी दस मिनट पहले ही बनाएं हैं। तुम दोनों को अच्छे लगेंगे।’, वे बोलीं।

उस दोने से हम दोनों ने भी कुछ ले कर चखा। नमकपारे सचमुच बहुत कुरकुरे और स्वादिष्ट थे।

‘कितने हुए?’, चाय पी लेने के बाद मैंने पचास रुपये का नोट देते हुए पूछा।

‘बीस’, उन्होंने तीस रूपए वापस करते हुए कहा।

‘अरे आप नमकपारा जोड़ना भूल गयीं’, मैं बोला।

एक भ्रूभंगित मुस्कान के साथ उन्होंने कहा - ‘कौन से नमकपारे’?

‘अरे, आप दोनों लोग चाय पीते और ये दोनों ऐसे ही बैठे रहते? मेरे नाती-पोते भी इन दोनों के बराबर हैं।  वो तो इनको मेरी ओर से था’।

नीचे श्यामला देवी के मंदिर की घंटियो की मधुर आवाज़ स्पष्ट सुनायी पड़ रही थी।

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Note- the newspaper erroneously published someone else's photograph instead of mine 
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Saturday, November 2, 2019

गोधूलि (साकी की प्रसिद्द कहानी ‘डस्क’ का हिन्दी अनुवाद ) - Published in 'कादम्बिनी' नवम्बर २०१९ अंक



गोधूलि
(साकी की प्रसिद्द कहानी ‘डस्क’ का हिन्दी अनुवाद http://epaper.livehindustan.com/epaper/Magazine/Kadambani/2019-11-01/520/Page-1.html




नार्मन गोर्ट्स्बी पार्क की बेंच पर बैठा हुआ था। उसकी पीठ के पीछे घास की पट्टी के बाद पार्क की रेलिंग थी और सामने एक चौड़ा वाहन पथ। लन्दन का प्रसिद्द हाईड पार्क कार्नर, वाहनों के शोर शराबे के साथ, उसके ठीक दाहिनी ओर स्थित था। शुरुआती मार्च की संध्या का लगभग साढ़े छह का समय। मद्धिम सी चांदनी और, ढेर सारे स्ट्रीट लैम्प्स, पूर्णरूपेण पसर चुकी गोधूलि के प्रभाव को कम करने का असफल प्रयास कर रहे थे। सड़क और फूटपाथ पर सन्नाटा था, पर पार्क में  बेंचों-कुर्सियों पर बैठीं या हिलती डुलती सी कई अस्पष्ट आकृतियाँ उस हलके से प्रकाश में मौजूद थीं, जैसे वे सभी उस उदास धुंधलके में समाहित हों ।  

      गोर्ट्स्बी को यह दृश्य भा रहा था क्योंकि वह उसके वर्तमान मूड से मेल खा रहा था। उसके अनुसार  गोधूलि हारे हुए लोगों का समय था; और ऐसे पुरुष और महिलाएं जो लड़ लड़ कर हार गये, जिन्होंने अपनी फूटी किस्मत और मृत आशाओं को यथा संभव लोगों की निगाहों से छुपा कर रखा था, इसी समय निकलते हैं, जिससे उनके झुके कंधों, मलिन वस्त्रों और, दुखी आँखों को न कोई देख पाए और न कोई प्रश्न करे। झाड़ियों और रेलिंग के यवनिका के उस पार चमकीले प्रकाश और ट्रैफिक का शोर शराबा था। गोधूलि में से प्रकाश बिखेरती खिडकियों की कतारें दीख पड़ रही थीं। यह  उन लोगों के बसेरे थे जो अपने जीवन संघर्ष में विजयी रहे थे, या कम से कम अभी हार तो नहीं ही माने थे। उस बेला में गोर्ट्स्बी अपने को हारे हुओं में ही रख रहा था । पैसे उसके लिए समस्या नहीं थे ; यदि वह चाहता तो वह आराम से उस प्रकाश और शोर के मार्ग पर निकल जाता और उन सबके  बीच स्थान ग्रहण कर लेता जो अपनी सम्पन्नता का आनन्द उठा रहे थे । वह तो किसी एक अलग, अनिर्वचनीय से उद्देश्य में असफल हो गया था। उसका हृदय दुःख और नैराश्य से भरा था और उसे उस अँधेरे के अपने आस पास के साथियों को देखने-समझने और वर्गीकृत करने में किसी दोषदर्शी सा संतोष प्राप्त हो रहां था ।

            बेंच पर उसके बगल में एक वृद्ध से सज्जन बैठे थे। उनके हाव-भाव बता रहे थे कि चुनौतियों से लड़ने की शक्ति उनमें अब न थी । उनके कपडे ठीक-ठाक से लग रहे थे, परन्तु इतने अच्छे भी नहीं, कि उनसे सम्पन्नता झलके। एक ऐसा इंसान जो अकेले ही रोने को मजबूर हो। जब वो जाने के लिए उठे तो गोर्ट्स्बी ने मन में सोचा कि यह वापस अपने घर ही जा रहे होंगे जहां इन्हें कोई पूछता ही नहीं होगा, या फिर, किसी ऐसे सूने से डेरे पर,  जिसका किराया चुका पाना ही अब इनकी एक मात्र आकांक्षा होगी । धीरे -धीरे वे अँधेरे में आँखों से ओझल हो गए, और तुरंत ही उनके स्थान पर एक नवयुवक आ कर बैठ गया । उसके कपडे तो काफी अच्छे थे परन्तु भाव-भंगिमा में वह अपने पूर्ववर्ती वृद्ध सज्जन जितना ही दुखी लग रहा था। बैठते-बैठते उसके मुंह से कुछ अपशब्द भी निकले,  जिस से गोर्ट्स्बी को यकीन हो गया की यह भी अपने हालात से खुश नहीं था

     “तुम कुछ अच्छे मूड में नहीं लगते ?”, गोर्ट्स्बी ने कहा। उसे लगा कि उस युवक की उस मुखर  अभिव्यक्ति में यह अपेक्षित था कि उसका संज्ञान लिया जाय
     युवक ने कुछ अजीब तरीके से गोर्त्स्बी को देखा......... अगर आपकी भी स्थिति मेरे जैसी हो तो आप भी अच्छे मूड में नहीं रहेंगे, उसने कहा मैंने अपने जीवन की सबसे बड़ी मूर्खता की है।

अच्छा?”... गोर्त्स्बी ने कहा। अत्यंत निरपेक्ष भाव से।

युवक ने कहा मैं आज ही यहाँ आया मुझे बर्कशायर स्क्वायर में पैटागोनियन होटल में रुकना था, लेकिन यहाँ आ कर पता चला की उसे तोड़ कर उसकी जगह एक थिएटर बना दिया गया है। खैर टैक्सी वाले ने मुझे एक और होटल का पता दिया और वहाँ पहुँचते ही मैंने अपने लोगों को एक पत्र लिखा, जिसमे उस नयी जगह का पता दिया था उसके बाद मैं एक साबुन की टिकिया खरीदने निकल गया। असल में,  जल्दबाजी में अपने सामान में साबुन की टिकिया रखना भूल गया था, और मुझे होटल का साबुन पसंद नहीं है थोड़ी देर इधर उधर घूमने और एक ड्रिंक लेने के बाद मैं जब वापस जाने के लिए सोचा तो अचानक मुझे एहसास हुआ कि मुझे तो अपने होटल का नाम याद ही  नहीं, और न ही वह सड़क जिस पर वह  होटल था अच्छी मुसीबत हो गयी है मेरे लिए एक ऐसे व्यक्ति के लिए जिस का लन्दन में कोई दोस्त या परिचित न हो !  हाँ,  मैं अपने परिवार को टेलीग्राम भेज तो सकता हूँ, होटल के पते के लिए, लेकिन मेरा पत्र तो कल से पहले वहाँ पहुंचेगा नहीं अब स्थिति यह है है कि मेरे पास पैसे ही नहीं है । होटल से एक शिलिंग ले कर निकला था जो साबुन की टिकिया और ड्रिंक में ही खत्म हो गए, और अब बस जेब में दो पेन्स ले कर टहल रहा हूँ पता नहीं रात कैसे गुज़र होगी!

वृत्तांत के बाद एक भावपूर्ण मौन ।

कुछ क्षणों के बाद उसने कहा, आप सोच रहे होंगे की मैंने एक असंभव सी कहानी बना डाली है।उसकी आवाज़ में थोड़ा  रोष सा था

“न, न, बिलकुल भी असंभव नहीं यह।” गोर्ट्स्बी ने गंभीरता से कहा। “मुझे याद है कि एक बार मैंने भी कुछ ऐसा ही किया था एक अन्य देश की राजधानी में। और उस घटना के दौरान तो हम दो लोग थे जो उसे और उल्लेखनीय बनाता है । संयोग से हमें यह याद था कि हमारा होटल एक नहर के किनारे था, और जैसे ही ढूंढते ढूंढते हम उस नहर के पास पंहुचे, हम अपना होटल पा गये”।

“किसी विदेशी शहर में तो मेरे लिए थोड़ा और आसान होता । दूतावास जाता और वहाँ से मदद मिल जाती। लेकिन अपने ही देश के किसी शहर में ऐसी समस्या में पड़ना तो और भी कठिन है । और अब तो यदि किसी सहृदय व्यक्ति ने मुझे कुछ उधार दे दिया तब तो ठीक है , अन्यथा आज की रात तो नदी किनारे सोना पड़ेगा। पर फिर भी, मुझे यह अच्छा लगा की कम से कम आपने यह तो माना की मेरे साथ घटी घटना असंभव नहीं है

इस अंतिम वाक्य में एक गर्मजोशी सी थी। शायद इस उम्मीद में कि वह अपेक्षित सहृदयता गोर्ट्स्बी में ही हो।

हाँ हाँ, बिलकुल सही, गोर्ट्स्बी ने धीरे धीरे बोला। पर तुम्हारी कहानी की कमज़ोर कड़ी यह है की तुम्हारे पास मुझे दिखाने को वह साबुन की टिकिया नहीं है।
युवक को जैसे झटका लगा, वह अपने ओवरकोट की जेबें टटोलने लगा, और उछल कर खड़ा हो गया। लगता है कि मैंने अपनी साबुन की टिकिया भी गुम कर दी।, उसने भुनभुनाते हुए कहा।

क्या तुम्हे नहीं लगता कि” गोर्ट्स्बी ने कहा, एक ही शाम, होटल और साबुन की टिकिया, दोनों ही गुम कर देना, कुछ ज्यादा ही लापरवाही है?”

पर युवक यह सब सुनने के लिए नहीं रुका। वह तुरंत ही अपना  सर ऊँचा किये हुए आगे निकल चुका था।

अफ़सोस!गोर्ट्स्बी ने सोचा। साबुन की टिकिया लेने निकलना, यही एक मात्र विश्वसनीय हिस्सा था उसकी कहानी का, लेकिन उस में इतनी दूरदर्शिता नहीं थी की वह एक साबुन की टिकिया अपने पास रख लेता- एक अच्छी तरह पैक की हुयी साबुन की टिकिया- जैसे कोई दुकानदार पैक कर के देता है। और फिर, ऐसे काम में तो दूरदर्शिता और सावधानी अत्यंत ही आवश्यक है , सोचते हुए गोर्ट्स्बी भी चलने के लिए उठा; कि तभी उसकी आँखें आश्चर्य से फ़ैल गयीं । नीचे बेंच के पास कागज में पैक एक अंडाकार वस्तु थी, वैसी ही जैसे कोई दक्ष दुकानदार पैक करता है।  “और यह साबुन की टिकिया के अतिरिक्त और क्या हो सकती थी , जो कि निश्चित ही  बेंच पर बैठते समय उस युवक के कोट से गिर गयी होगी” - गोर्ट्स्बी  का मन ग्लानि से भर गया। वह तेज़ी से उस ओवरकोट वाले युवक की खोज में उस दिशा में चल पड़ा जिधर वह गया था। अँधेरा बढ़ गया था और खोजते खोजते गोर्ट्स्बी भी निराश हो चुका था कि तभी उसने उस युवक को एक सड़क के किनारे देखा । ऐसा लग रहा था की वह यह  सोच नहीं पा रहा था कि  बाएं जाए या दायें। जब गोर्ट्स्बी  ने उसे पुकारा तो वह  लगभग आक्रामक सा हो कर उसकी और मुड़ा।

तुम्हारी कहानी का वह  अहम गवाह मिल गया हैगोर्ट्स्बी ने कहा, और साबुन की टिकिया उसकी और बढ़ा दी। शायद ये तुम्हारी कोट की जेब से गिर गयी थी जब तुम झटके से बेंच पर बैठे। मेरे व्यवहार और अविश्वास के लिए मुझे माफ कर दो, पर सचमुच उस समय तुम्हारे पक्ष में कुछ भी नहीं था। और जब यह टिकिया तुम्हारी सत्यता की गवाही दे रही है तो मुझे उसके पक्ष में ही निर्णय लेना होगा। मेरे विचार से एक गिन्नी से तो तुम्हारा काम चल जाएगा --

नवयुवक ने झटपट उस गिन्नी को अपनी जेब में डाल लिया ।

यह है मेरा कार्ड जिस पर मेरा पता दिया है। इस सप्ताह किसी भी दिन तुम मुझे वह गिन्नी लौटा देना, गोर्ट्स्बी ने कहा। और हाँ, साबुन की टिकिया को अब गुम नहीं करना, यह तुम्हारी अच्छी दोस्त साबित हुई है।

“सौभाग्य ही था जो यह आपको मिल गयी।“ युवक ने कहा, और शुक्रिया अदा करते हुए वह नाइट्सब्रिज की दिशा में तेजी से चल दिया।

बेचारा! सचमुच बड़ी मसीबत में था।, गोर्ट्स्बी ने स्वयं से कहा। और मेरे लिए भी यह एक सबक है कि मैं अपने आप को ज्यादा होशियार न समझा करूँ।” 

गोर्ट्स्बी फिर से पार्क की उसी बेंच की तरफ चल दिया, और जैसे ही वहाँ पहुंचा उसने देखा  कि  युवक से पहले जो वृद्ध सज्जन उस बेंच पर बैठे थे वे बेंच के नीचे कुछ ढूंढ रहे हैं।

क्या आपका कुछ गुम हो गया है?” गोर्ट्स्बी ने पूछा।

जी हाँ , श्रीमानवृद्ध सज्जन ने कहा। एक साबुन की टिकिया।



       अनुवाद – डॉ स्कन्द शुक्ल